Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #1115
आत्मचिंतन · Self-reflection
कबीर यह मन मसखरा, कहूं तो मानै रोस। जा मारग साहिब मिलै, तहां न चालै कोस।।
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