Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #1298

आत्मचिंतन · Self-reflection

माखी गहै कुवास को, फूल वास नहिं लेयै। मधुमाखी हैं साधु जन, पुष्‍प बास चित देयं।।