Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #1477

गुरु · Guru

ए मरजीवा अमृत पीवा, क्‍यों धसि मरसि पताल। गुरु की दया साधु की संगति, निकरि आव एहि द्वार।।