Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #1511
आत्मचिंतन · Self-reflection
घाट भुलाना बाट बिनु, वेष भुलानी कानि। जाकि मांडी जगत महं, सो न परा पहिचानि।।
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