Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #1679
आत्मचिंतन · Self-reflection
राह विचारी क्या करै, जो पन्थि नचले बिचारि। अपना मारग छोड़ि के, फिरे उजारि उजारि।।
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