Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #1730
आत्मचिंतन · Self-reflection
हृदय भीतर आरसी, मुख देखा नहिं जाय। मुख तो तब ही देखिए, जब दिल की दुविधा जाय।।
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