Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #218

भक्ति · Devotion

हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार। मैमता घूमत रहै, नाहि तन की सार।।