Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #2183

आत्मचिंतन · Self-reflection

कबिरा भूलि बिगारिया, तू ना कर मैला चित्त। साहब गरुवा चाहिये, नफर बिगारो नित्त।।