Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #2242
करुणा · Compassion
जीव हनै हिंसा करै, प्रगट पाप सिर होय। निगम पुनि ऐसे पाप तें, भिस्त गया नहिं कोय।।
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