Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #261

आत्मचिंतन · Self-reflection

माला पहिरै मनभुषी, ताथै कछू न होइ। मन माला को फैरता, जग उजियारा सोइ।।