Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #262

अहंकार · Ego

कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार। मन को काहे न मूंडिये, जामे विषम-विकार।।