Kabir Amritwani
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #277
आत्मचिंतन · Self-reflection
कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ। पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज।।
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