Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #295

गुरु · Guru

जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर। एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर।।