Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर दोहा #416

गुरु · Guru

साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह। कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह।।