Kabir Amritwani
Kabir Ke Dohe
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Kabir Amritwani
कबीर दोहा #794
भक्ति · Devotion
सुमिरन सों मन लाइये, जैसे दीप पतंग। प्राण तजे छिन एक में, जरत न मोरै अंग।।
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