Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के आत्मचिंतन पर दोहे

अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए

आत्मचिंतन · Self-reflection

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

भावार्थ: जब मैं इस संसार में बुराई की खोज करने निकला, तो मुझे कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं मिला। परंतु, जब मैंने अंतर्मुखी होकर अपने स्वयं के मन का विश्लेषण किया, तो पाया कि मुझसे अधिक बुरा और दोषपूर्ण कोई और नहीं है।

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आत्मचिंतन · Self-reflection

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ। नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि मनुष्य का मन एक बाजीगर (मदारी) के बंदर की तरह है। जिस प्रकार मदारी बंदर को तरह-तरह के करतब और नाच दिखाकर अपने नियंत्रण में रखता है, उसी प्रकार यह मायावी संसार और इंद्रियाँ मनुष्य के मन को भ्रमित कर उसे अपने वश में रखती हैं, जिससे वह वास्तविक सत्य से दूर रहता है।

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आत्मचिंतन · Self-reflection

बानी से पहचानिए, साम चोर की घात। अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि व्यक्ति की वाणी से उसके स्वभाव और इरादों की पहचान होती है, ठीक वैसे ही जैसे चोर की आहट से उसकी चोरी का पता चलता है। मनुष्य के भीतर जो कर्म और विचार होते हैं, वही अंततः उसकी भाषा और शब्दों के माध्यम से बाहर प्रकट होते हैं।

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