Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के गुरु पर दोहे

अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए

गुरु · Guru

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥

भावार्थ: गुरु और गोविन्द दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसे प्रणाम करें? गुरु के चरणों में ही, क्योंकि उन्होंने ही गोविन्द तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।

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गुरु · Guru

सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥

भावार्थ: सतगुरु की महिमा अनंत है और उनका उपकार भी अनंत। उन्होंने अनंत दृष्टि खोल दी और अनंत का दर्शन कराया।

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गुरु · Guru

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट। बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों या गहरे ज्ञान को उन लोगों के सामने प्रकट न करें जो अज्ञानी हैं या जिनमें उसे समझने की क्षमता नहीं है। जैसे कांच के व्यापारियों के बाजार में असली हीरे की कीमत कोई नहीं समझता, वैसे ही मूर्खों के बीच सत्य व्यर्थ है। मौन धारण करें और धैर्यपूर्वक अपने आत्म-साक्षात्कार की प्रतीक्षा करें।

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