गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥
भावार्थ: गुरु और गोविन्द दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसे प्रणाम करें? गुरु के चरणों में ही, क्योंकि उन्होंने ही गोविन्द तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।
1Kabir Amritwani
अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥
भावार्थ: गुरु और गोविन्द दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसे प्रणाम करें? गुरु के चरणों में ही, क्योंकि उन्होंने ही गोविन्द तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।
1पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
भावार्थ: किताबें पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, पर कोई ज्ञानी न बन सका। जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ ले, वही सच्चा पंडित है।
2बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
भावार्थ: जब मैं संसार में बुराई खोजने निकला तो कोई बुरा न मिला। जब अपने मन में झाँका तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं।
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