साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
भावार्थ: हे प्रभु! इतना ही दीजिए जिसमें परिवार का निर्वाह हो जाए — न मैं भूखा रहूँ, न कोई अतिथि मेरे द्वार से भूखा लौटे।
1Kabir Amritwani
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साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
भावार्थ: हे प्रभु! इतना ही दीजिए जिसमें परिवार का निर्वाह हो जाए — न मैं भूखा रहूँ, न कोई अतिथि मेरे द्वार से भूखा लौटे।
1जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं। सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माहिं॥
भावार्थ: जब तक 'मैं' (अहंकार) था, तब तक हरि नहीं थे; अब हरि हैं तो 'मैं' नहीं रहा। भीतर का दीपक दिखते ही सारा अंधकार मिट गया।
2दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥
भावार्थ: दुख में सभी ईश्वर को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं। यदि सुख में भी स्मरण किया जाए तो दुख आए ही क्यों?
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