पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
भावार्थ: किताबें पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, पर कोई ज्ञानी न बन सका। जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ ले, वही सच्चा पंडित है।
1Kabir Amritwani
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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
भावार्थ: किताबें पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, पर कोई ज्ञानी न बन सका। जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ ले, वही सच्चा पंडित है।
1प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय॥
भावार्थ: प्रेम न खेत में उगता है, न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा — जिसे चाहिए, वह अपना सिर देकर ही ले सकता है।
2जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल। तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल॥
भावार्थ: जो व्यक्ति आपके जीवन में कष्ट, द्वेष या बाधाएं (काँटे) उत्पन्न करता है, उसके प्रति आप प्रेम, करुणा और क्षमा (फूल) का भाव रखें। ऐसा करने से आप स्वयं आध्यात्मिक शांति और आनंद प्राप्त करेंगे, जबकि घृणा करने वाला व्यक्ति अपने ही क्रोध और नकारात्मकता के जाल में फंसकर मानसिक पीड़ा और विनाश का सामना करेगा।
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