Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के कर्म पर दोहे

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कर्म · Action

खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह। आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह॥

भावार्थ: एक सच्चा योद्धा वह है जो युद्ध के मैदान को कभी नहीं छोड़ता और दो विरोधी सेनाओं के बीच डटकर लड़ता है। वह अपने मन में न तो जीवन की आशा रखता है और न ही मृत्यु का भय, बल्कि केवल अपने कर्तव्य और वर्तमान क्षण के संघर्ष में लीन रहता है।

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कर्म · Action

परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि। खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरी स्त्री (परनारी) के मोह और वासना में डूबा रहता है, वह वास्तव में अपने पतन के मार्ग को प्रशस्त कर रहा है। ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप से अनैतिकता का उपभोग करता है, लेकिन अंततः उसका मानसिक असंतुलन और चारित्रिक पतन सबके सामने प्रकट हो जाता है, जिससे वह समाज में उपहास और आंतरिक विनाश का पात्र बनता है।

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कर्म · Action

मांस मछलिया खात हैं, सुरापान से हेत। ते नर नरकै जाहिंगे, माता पिता समेत।।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग मांस और मछली का सेवन करते हैं और शराब के प्रति आसक्त रहते हैं, वे अपनी इंद्रियों के दास बन जाते हैं। ऐसा तामसिक जीवन जीने वाले व्यक्ति न केवल स्वयं आध्यात्मिक पतन और नरक की ओर जाते हैं, बल्कि अपने बुरे कर्मों के प्रभाव से अपने पूर्वजों और परिवार को भी संकट में डालते हैं।

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