Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के वैराग्य पर दोहे

अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए

वैराग्य · Detachment

जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच। वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति के जीवन में कोई नैतिक बंधन या आत्म-अनुशासन नहीं है और जिसके हृदय में सत्य का वास नहीं है, उसके साथ संबंध नहीं रखना चाहिए। ऐसा व्यक्ति कांच के उस बर्तन की तरह है जो बाहर से चमकता तो है, लेकिन अंदर से खाली है और जरा सी चोट लगते ही बिखर जाता है, जिससे केवल नुकसान होता है।

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वैराग्य · Detachment

साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध। आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि सच्चे साधु, पवित्र आत्माओं और वीर योद्धाओं का मार्ग अत्यंत गहरा और अथाह होता है। उनकी महानता इस बात में निहित है कि उन्होंने शरीर के प्रति अपनी आसक्ति और भौतिक सुखों की लालसा को पूरी तरह त्याग दिया है, जिससे वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

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वैराग्य · Detachment

कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह। देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि इस नश्वर शरीर के रहते हुए ही परोपकार और दान का मार्ग अपनाओ। जब यह शरीर राख (खेह) में बदल जाएगा, तब यह भौतिक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और फिर कोई भी इस शरीर के माध्यम से कुछ देने या करने में सक्षम नहीं होगा।

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