Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के ध्यान पर दोहे

अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए

ध्यान · Meditation

हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध। हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति सांसारिक सीमाओं और सामाजिक बंधनों के भीतर जीता है, वह साधारण मनुष्य है। जो इन सीमाओं को पार कर आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, वह साधक है। परंतु, जो व्यक्ति सीमा और असीम, दोनों के द्वंद्व और अहंकार को त्याग देता है, उसकी आध्यात्मिक अवस्था अत्यंत गहन और अनंत हो जाती है।

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ध्यान · Meditation

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय। सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि मनुष्य को बाहरी दुनिया के जाग्रत अवस्था में भी आंतरिक शांति और वैराग्य (सोवन) का अनुभव करना चाहिए। साधना में ऐसी गहरी एकाग्रता हो कि आत्मा का ध्यान परमात्मा से एक अटूट धागे की तरह जुड़ा रहे, जो सांसारिक झटकों से कभी न टूटे।

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ध्यान · Meditation

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार। बाल सने ही सांइया, आवा अन्त का यार।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार और अज्ञान के पर्दे को हटा देता है, तब उसे परमात्मा का साक्षात दर्शन होता है। वह ईश्वर, जो अत्यंत प्रेममयी और करुणामय है, अंततः उस आत्मा का सच्चा साथी बन जाता है जिसने स्वयं को जान लिया है।

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