Kabir AmritwaniKabir Ke Dohe

Kabir Amritwani

कबीर के अहंकार पर दोहे

अर्थ सहित — खोजिए, सहेजिए और साझा कीजिए

अहंकार · Ego

माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नही जाइ। मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि यदि आपने भौतिक संपदा और सांसारिक मोह-माया का त्याग कर दिया है, तो भी आपकी आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है यदि आपने अपने भीतर के अहंकार (मान) का त्याग नहीं किया। कई बड़े तपस्वी और ज्ञानी लोग बाहरी दुनिया को छोड़ देते हैं, लेकिन उनका सूक्ष्म अहंकार उन्हें निगल जाता है और दूसरों को भी नीचा दिखाता है।

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अहंकार · Ego

मरण भला तब जानिए, छूट जाए हंकार। जग की मरनी क्यों मरें, दिन में सौ-सौ बार।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि वास्तविक मृत्यु वह है जिसमें मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाए। सांसारिक दुखों और सामाजिक प्रतिष्ठा के मोह में पड़कर बार-बार मानसिक रूप से मरना व्यर्थ है, क्योंकि वह मृत्यु मुक्ति नहीं बल्कि अंतहीन पीड़ा है।

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अहंकार · Ego

साधु रण में जूझकर, टूटन दे हंकार। जग की मरनी क्यों मरें, दिन में सौ-सौ बार।।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि एक सच्चे साधक को अपने भीतर के अहंकार रूपी शत्रु से युद्ध करना चाहिए और उसे पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। यदि हम इस आंतरिक अहंकार को नहीं मारते, तो हमें संसार के मोह-माया और दूसरों के द्वारा दिए गए मानसिक दुखों की मृत्यु दिन में सौ बार झेलनी पड़ती है।

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