माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर। आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर॥
भावार्थ: न माया मरी, न मन मरा, शरीर बार-बार नष्ट होते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं — ऐसा कबीर कहते हैं।
1Kabir Amritwani
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माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर। आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर॥
भावार्थ: न माया मरी, न मन मरा, शरीर बार-बार नष्ट होते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं — ऐसा कबीर कहते हैं।
1चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥
भावार्थ: चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े — दो पाटों के बीच में कोई भी साबुत नहीं बचता।
2माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का भौतिक शरीर तो बार-बार जन्म लेकर नष्ट हो जाता है, लेकिन उसके भीतर की माया, अहंकार और मन की वासनाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। इच्छाएं और तृष्णाएं इतनी प्रबल होती हैं कि वे मृत्यु के बाद भी आत्मा का पीछा करती हैं, जिससे जन्म-मरण का चक्र निरंतर चलता रहता है।
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